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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

            *९९*

*भगवान और भक्त का सम्बन्ध बड़ा मधुर होता है*

          आपने लिखा कि कर्मों का फल तो भोगना ही पड़ता है--यह बिलकुल ठीक है ; कितु इसके साथ अपवाद भी है। जिस प्रकार किसी अपराधी को हाईकोर्ट ने फाँसी की सजा दे दी है, उस सजा को कोई रोक हो सकता पर यदि बादशाह या उस राज्य का सदस्य अधिकारी चाहें तो उसकी सजा बदल सकते हैं, उसे बिल्कुल माफ भी कर सकते हैं, यही नहीं ऐसी घटनाएँ कितनी बार हो चुकी है, उसी प्रकार कर्म के फल को भगवान चाहें तो भोगने से किसी को बिल्कुल बरी कर सकते हैं। अवश्य ही भगवान का भक्त यह चाहता नहीं। किसी दिन भगवत्कृपा से ही आप समझ पाएँगे कि वस्तुत भगवान् और भक्त का सम्बन्ध कितना मधुर होता है। हमारी कल्पना इस जगत को देखकर उसी आधार पर भगवान् के विषय में निर्णय देती है। पर उसका यह निर्णय वस्तुतः बिल्कुल गलत है। भैया! भगवान कितने दयालु हैं, यह बात तब तक हमारी धारणा में आ ही नहीं सकती जब तक वे स्वयं समझा न दें। अवश्य ही न समझने पर भी वस्तुस्थिति तो यह है ही कि हम सभी उनके अहैतुक दयाप्रवाह में ही बह रहे हैं और उनके अपने-आप पहुँच जायेंगे। आप लोगों के जीवन को विचारता हूँ तो यही प्रतीत होता है कि जिस दिन आप इस दया का अनुभव करेंगे, उस दिन मुग्ध हो जायेंगे। भगवान् ने कहाँ से लाकर आप लोगों को कहाँ रखा है और कहाँ ले जा रहे हैं, यह बात अभी समझ में न आने पर अगर विश्वास कर सकें तो निरन्तर ध्यान में रखने की चेष्टा करें कि अब तक आपका किंचित् भी अमंगल नहीं हुआ है और न आगे होगा। मैं इस बात को किसी को तर्क से समझा नहीं सकता ; लेकिन सभी से प्रार्थना कर सकता हूँ कि सभी अधिक-से-अधिक इस पर विश्वास करें। 
        किसी भी परिस्थिति में चिन्ता बिल्कुल न हो।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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