Posts

159

*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*          *१५९* *मेरी इतनी ही सलाह है*             मेरी इतनी ही सलाह है कि सत्संग में जो कुछ भी सुनें, उसको प्रिया-प्रियतम के अखण्ड स्मरण में सहायक बना लें। बस इससे अधिक मैं क्या लिखूँ--   तनहिं राखु सत्संग में, मनहि प्रेमरस भेव। सुख चाहत हरीबन्सहित, कृष्ण कल्पतरु सेव।। निकसि कुंज ठाढ़े भए, भुजा परस्पर अंस। राधाबल्लभ-मुख-कमल, निरखत हित हरिबंस ।। सबसे हित निकाम मन, बृन्दाबन बिश्राम। राधाबल्लभ लाल कौ, हृदय ध्यान, मुख नाम।। रसना कटौ जु अनरटौ, निरखि अन फुटौ नैन। सवन फुटो जो अनसुनौ, बिनु राधा जसु बैन।।         *         *         *            और सबसे अन्तिम बात यह है कि निरन्तर नाम लीजिये ; और कुछ भी नहीं करना है, सब भगवान् करेंगे।           संतों से सुना है--‘दूसरा क्या करता है, इस ओर मत देखो ; तुमसे कितने पाप होते हैं, यह देखो।' निष्पाप होने का यह सरल साधन है। यदि तुम्हारे मन मे...

158

*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*              *१५८* *यही सार है--यही करना है*            जीवन का प्रत्येक क्षण प्रिया-प्रियतम के चिन्तन में बीते, इसके लिए खूब सचेष्ट रहें। इस अनमोल जीवन के समाप्त होने से पूर्व ही श्रीप्रिया-प्रियतम को मन में बसा लिया, तब तो सब कुछ कर लिया ; नहीं तो सब कुछ करके भी जीवन व्यर्थ ही समाप्त हो गया--यह सर्वथा सच्ची बात है।             भगवान की स्मृति निरन्तर बनी रहे, इसी में जीवन की सफलता है, इसी की चेष्ठा करनी है।             अनमोल जीवन को दूसरों की पापमयी बातों को देखने-सुनने में मत खोइये। दूसरे के दोषों की ओर से दृष्टि मोड़कर प्रियाप्रियतम में मन लगाइये--यही सार है।             प्रिया-प्रियतम के रूप-सागर में मन को डूबा दें, मन को उस सौंदर्य-समुद्र में सर्वथा मिलकर एकमेव हो जाने दें। फिर यह संसार नहीं दीखेगा, वे ही दिखेंगे। आपकी जलन सदा के लिए शान्त हो जायगी। यही करना है, यही करना चाहिये। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाब...

157

*आस्तिकता की -शिलाएँ*           *१५७* *खूब तेजी से भगवानकी ओर बढिये*                  जीवन तो समाप्त होगा ही, चाहे विषयों के संग बीते अथवा भगवान के संग। भगवान की ओर जातना बढियेगा, उतनी शान्ति बढेगी। उनको छोडकर जगत के किसी भी प्रपञ्च में सुख खोजियेगा, जलन बढेगी। आज तक जितने संत हुए हैं, सब-के-सब यही कह गये हैं। जीवन का भरोसा नहीं है, अतएव खूब तेजी से भगवान् की ओर बढिये। अवश्य ही घबराने की जरूरत नहीं है। भगवान् की पूर्ण कृपा आपके साथ है। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

156

*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*               *१५६* *वे आपकी भी सुन सकते हैं, यदि आप उन्हें सुनाना चाहें*              यदि सच्ची चाह हो तो भगवान की दया से निरन्तर नामजप होना खूब आसानी से सम्भव है। इसलिये आप मन से श्रीकृष्ण के आगे अपनी चाह प्रकट कीजिये, फिर देखिये भजन अवश्य होगा। मन में कुछ रखकर ही प्रायः लोग प्रार्थना करते हैं ; इसलिये भगवान् भी देखते हैं--'अभी ठीक चाह नहीं, चलो, अभी टाल दें। यदि हृदय की सारी शक्ति से भगवान् के सामने एक बार भी रोने लगे तो फिर भगवान् उसी क्षण असम्भव को भी सम्भव कर देते हैं। इसलिये आपसे भी प्रेमपूर्वक प्रार्थना है कि निरन्तर नामजप की चाह लेकर आप श्रीकृष्ण के सामने रोज नियमित रूपसे प्रार्थना करें। जिस दिन प्रार्थना हृदय से होगी, उसी क्षण से भजन होने लगेगा। श्रीकृष्ण पर भरोसा करके मन से उनको कहिये-लिखिये। वे सबकी सुनते हैं और आपकी भी सुन सकते हैं, यदि आप उन्हें सुनना चाहें। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

155

*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*            *१५५* *एक ही परामर्श*              मैं तो आपको एक ही परामर्श देता हूँ--प्रियाप्रियतम को कम-से-कम पाँच मिनट पर तो याद कर ही लें।             जैसे हो, वैसे प्रियाप्रियतम की अखण्ड स्मृति बनी रहे, यही करना है। आप अवश्य करें--यही मेरा सप्रेम अनुरोध है। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

154

*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*           *१५४* *मन को एकमात्र प्रिया-प्रियतम की ओर केन्द्रित करें*             सत्संग से पूरा-पूरा लाभ उठाना चाहिये। पूरा लाभ यही है कि मन भगवान में पूर्णतया लग जाय ; सब ओर से प्रीति हटकर एकमात्र प्रिया-प्रियतम की ओर केन्द्रित हो जाय-- नरक-स्वर्ग-अपवर्ग-आस नहिं त्रास है। जहँ राखौ तहँ रहौं मानि सुखरास है।। देव ! दया करि दान 'न भूलौं केलि' को। भगवत बलित तमाल बिलोकौं बेलि को।। दुख-सुख भुगते देह, नहीं कछु संक है। निंदा-अस्तुति करौ राव क्या रंक है।। परमारथ ब्यौहार बनौ कै ना बनौ। अंजन है मम नैन रसिक भगवत सनौ।। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

153

*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*             *१५३* *और क्या चाहिए ?*              आप सत्संग से पूरा-पूरा लाभ उठाने की चेष्ठा कर रहे हैं, सो अच्छी बात है। आपको अब करना ही क्या है ? भजन और सत्संग में ही तो शेष जीवन बिता देना है। फिर उसमें उत्साह की कमी तो आनी ही नहीं चाहिए। सन्तों का सँग हो, नाम-जप हो तथा भगवान के रूप की झाँकी होती रहे, बस, और क्या चाहिये ? *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*