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Showing posts from May, 2020

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*          *१५९* *मेरी इतनी ही सलाह है*             मेरी इतनी ही सलाह है कि सत्संग में जो कुछ भी सुनें, उसको प्रिया-प्रियतम के अखण्ड स्मरण में सहायक बना लें। बस इससे अधिक मैं क्या लिखूँ--   तनहिं राखु सत्संग में, मनहि प्रेमरस भेव। सुख चाहत हरीबन्सहित, कृष्ण कल्पतरु सेव।। निकसि कुंज ठाढ़े भए, भुजा परस्पर अंस। राधाबल्लभ-मुख-कमल, निरखत हित हरिबंस ।। सबसे हित निकाम मन, बृन्दाबन बिश्राम। राधाबल्लभ लाल कौ, हृदय ध्यान, मुख नाम।। रसना कटौ जु अनरटौ, निरखि अन फुटौ नैन। सवन फुटो जो अनसुनौ, बिनु राधा जसु बैन।।         *         *         *            और सबसे अन्तिम बात यह है कि निरन्तर नाम लीजिये ; और कुछ भी नहीं करना है, सब भगवान् करेंगे।           संतों से सुना है--‘दूसरा क्या करता है, इस ओर मत देखो ; तुमसे कितने पाप होते हैं, यह देखो।' निष्पाप होने का यह सरल साधन है। यदि तुम्हारे मन मे...

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*              *१५८* *यही सार है--यही करना है*            जीवन का प्रत्येक क्षण प्रिया-प्रियतम के चिन्तन में बीते, इसके लिए खूब सचेष्ट रहें। इस अनमोल जीवन के समाप्त होने से पूर्व ही श्रीप्रिया-प्रियतम को मन में बसा लिया, तब तो सब कुछ कर लिया ; नहीं तो सब कुछ करके भी जीवन व्यर्थ ही समाप्त हो गया--यह सर्वथा सच्ची बात है।             भगवान की स्मृति निरन्तर बनी रहे, इसी में जीवन की सफलता है, इसी की चेष्ठा करनी है।             अनमोल जीवन को दूसरों की पापमयी बातों को देखने-सुनने में मत खोइये। दूसरे के दोषों की ओर से दृष्टि मोड़कर प्रियाप्रियतम में मन लगाइये--यही सार है।             प्रिया-प्रियतम के रूप-सागर में मन को डूबा दें, मन को उस सौंदर्य-समुद्र में सर्वथा मिलकर एकमेव हो जाने दें। फिर यह संसार नहीं दीखेगा, वे ही दिखेंगे। आपकी जलन सदा के लिए शान्त हो जायगी। यही करना है, यही करना चाहिये। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाब...

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*आस्तिकता की -शिलाएँ*           *१५७* *खूब तेजी से भगवानकी ओर बढिये*                  जीवन तो समाप्त होगा ही, चाहे विषयों के संग बीते अथवा भगवान के संग। भगवान की ओर जातना बढियेगा, उतनी शान्ति बढेगी। उनको छोडकर जगत के किसी भी प्रपञ्च में सुख खोजियेगा, जलन बढेगी। आज तक जितने संत हुए हैं, सब-के-सब यही कह गये हैं। जीवन का भरोसा नहीं है, अतएव खूब तेजी से भगवान् की ओर बढिये। अवश्य ही घबराने की जरूरत नहीं है। भगवान् की पूर्ण कृपा आपके साथ है। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*               *१५६* *वे आपकी भी सुन सकते हैं, यदि आप उन्हें सुनाना चाहें*              यदि सच्ची चाह हो तो भगवान की दया से निरन्तर नामजप होना खूब आसानी से सम्भव है। इसलिये आप मन से श्रीकृष्ण के आगे अपनी चाह प्रकट कीजिये, फिर देखिये भजन अवश्य होगा। मन में कुछ रखकर ही प्रायः लोग प्रार्थना करते हैं ; इसलिये भगवान् भी देखते हैं--'अभी ठीक चाह नहीं, चलो, अभी टाल दें। यदि हृदय की सारी शक्ति से भगवान् के सामने एक बार भी रोने लगे तो फिर भगवान् उसी क्षण असम्भव को भी सम्भव कर देते हैं। इसलिये आपसे भी प्रेमपूर्वक प्रार्थना है कि निरन्तर नामजप की चाह लेकर आप श्रीकृष्ण के सामने रोज नियमित रूपसे प्रार्थना करें। जिस दिन प्रार्थना हृदय से होगी, उसी क्षण से भजन होने लगेगा। श्रीकृष्ण पर भरोसा करके मन से उनको कहिये-लिखिये। वे सबकी सुनते हैं और आपकी भी सुन सकते हैं, यदि आप उन्हें सुनना चाहें। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*            *१५५* *एक ही परामर्श*              मैं तो आपको एक ही परामर्श देता हूँ--प्रियाप्रियतम को कम-से-कम पाँच मिनट पर तो याद कर ही लें।             जैसे हो, वैसे प्रियाप्रियतम की अखण्ड स्मृति बनी रहे, यही करना है। आप अवश्य करें--यही मेरा सप्रेम अनुरोध है। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*           *१५४* *मन को एकमात्र प्रिया-प्रियतम की ओर केन्द्रित करें*             सत्संग से पूरा-पूरा लाभ उठाना चाहिये। पूरा लाभ यही है कि मन भगवान में पूर्णतया लग जाय ; सब ओर से प्रीति हटकर एकमात्र प्रिया-प्रियतम की ओर केन्द्रित हो जाय-- नरक-स्वर्ग-अपवर्ग-आस नहिं त्रास है। जहँ राखौ तहँ रहौं मानि सुखरास है।। देव ! दया करि दान 'न भूलौं केलि' को। भगवत बलित तमाल बिलोकौं बेलि को।। दुख-सुख भुगते देह, नहीं कछु संक है। निंदा-अस्तुति करौ राव क्या रंक है।। परमारथ ब्यौहार बनौ कै ना बनौ। अंजन है मम नैन रसिक भगवत सनौ।। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*             *१५३* *और क्या चाहिए ?*              आप सत्संग से पूरा-पूरा लाभ उठाने की चेष्ठा कर रहे हैं, सो अच्छी बात है। आपको अब करना ही क्या है ? भजन और सत्संग में ही तो शेष जीवन बिता देना है। फिर उसमें उत्साह की कमी तो आनी ही नहीं चाहिए। सन्तों का सँग हो, नाम-जप हो तथा भगवान के रूप की झाँकी होती रहे, बस, और क्या चाहिये ? *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*             *१५२* *भजन के लिए काम छोड़ने की आवश्यकता नहीं*            भजन का सम्बन्ध मन  से है। काम छोड़ने पर भी मन तो साथ छोड़ेगा नहीं। जो मन आज है, वही फिर भी तरह-तरह के धोखे से भजन से हट सकता है। इसलिए पहले कुछ दिन अलग रहकर अच्छी तरह भजन का अभ्यास करके देख लेना चाहिए। भजन में मन लग जाय तो फिर सारे संसार का काम भले ही चौपट हो जाय, कोई हानि नहीं। पर भजन में मन न लगकर प्रमाद का जीवन न बने--इस विषय में विशेष सावधान रहना चाहिये।    *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*                *१५१* *एकमात्र श्रीकृष्ण की कृपा ही मनुष्य की रक्षा करती है।*            देखें, मैं जब अपने जीवन को देखता हूँ तो यह बात बिल्कुल स्पष्ट दीखती है कि मैं पग-पग पर फिसलता रहा हूँ और श्रीराधाकृष्ण मुझे पग-पग पर सँभालते रहे हैं। यदि वे न सँभालते तो न जाने जीवन किधर बह जाता। यदि श्रीराधाकृष्ण ने मुझे बचाया-सँभाला है तो किसी को मैं क्या बचाऊँगा ? बचाने वाले-सँभालने वाले वे एक हैं। जगत में माया से पार हो जाना सचमुच बड़ा ही कठिन है। मेरी तो ऐसी ही दृढ़ धारणा है कि जिसे श्रीराधाकृष्ण निकालेंगे, वही माया से निकल सकता है ; अपना पुरुषार्थ तनिक भी काम नहीं दे सकता। जिस समय विषयों का प्रलोभन आता है सारा विवेक निष्फल हो जाता है। एकमात्र श्रीकृष्ण की कृपा ही मनुष्य की रक्षा करती है। इसलिये हम लोगों को चाहिये कि चिन्ता बिल्कुल छोड़ दें। जिस दिन श्रीराधाकृष्ण चाहेंगे, उस दिन ही मनुष्य विषयों से मुख मोड़ सकता है। एक बात और है--जिसने श्रीकृष्ण की शरण ली है, किसी-न-किसी दिन श्रीकृष्ण उसका अवश्य उद्धा...

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*            *१५०* *शरीर ठीक रहते हुए ही इसका सुदपयोग कर लेना चाहिये*            आपके जीवन का वही क्षण सार्थक है, जिस क्षण आप प्रियतम का चिन्तन करते हैं। चाहे उत्तम-से-उत्तम कर्म हो, पर यदि वह भगवत्-संयोग से रहित है तो उसमें दोष आये बिना रह नहीं सकता। अतः कोई-सा काम करें, प्रिया-प्रियतम के चिन्तन को प्रधानता देकर ही करें।            जब तक शरीर काम देता है, तब तक इन्द्रियों को, मन को आप इच्छानुसार भगवत्सम्बन्ध में नियोजित कर सकते हैं। पर पता नहीं, कब शरीर लाचार हो जाय, ऐसे समय में बिना अभ्यास भगवच्चिन्तन होना बड़ा कठिन हो जाता है। उस समय शरीर की पीड़ा का ही चिन्तन अधिकांश प्राणियों को होता है। अतः शरीर के ठीक रहते हुए ही इसका सदुपयोग कर लेना चाहिये। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*              *१४९* *साधन की कसौटी*             प्रियाप्रियतम की स्मृति कैसी और कितनी होती है--सारी साधना की कसौटी इसी में है। यदि उनका विस्मरण हो तो समझना चाहिए कि पथ उल्टा है, चाहे वह पथ कितना भी सुन्दर क्यों न दीखे ; तथा यदि उनकी स्मृति बढ़ रही है तो पथ कितना भी कँटीला क्यों न दीखे समझना चाहिये, यही साधा पथ है।              बस, निरन्तर नाम लीजिये ; और कुछ भी नहीं करना है, सब भगवान करेंगे। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*              *१४८*  *खूब तेजी से भगवान की ओर बढिये*            जीवन तो समाप्त होगा ही, चाहे विषयों के सँग में बीते अथवा भगवान के सँग में। भगवान की ओर जितना बढियेगा, उतनी शान्ति बढ़ेगी। उनको छोड़कर जगत के किसी भी प्रपञ्च में सुख खोजियेगा, जलन बढ़ेगी। आज तक जितने सन्त हुए हैं, वे सब-के-सब यही कह गए हैं। जीवन का भरोसा नहीं है, अतएव खूब तेजी से भगवान की ओर बढिये। अवश्य ही घबराने की जरूरत नहीं है। भगवान की पूर्ण कृपा आपके साथ है। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*               *१४७* *बहुत समय बीत गया*          बहुत समय बीत गया। अब वास्तव में श्रीप्रिया-प्रियतम की प्रीति प्राप्त हो, यह चेष्टा करनी चाहिये-- कहत-सुनत बहुतै दिन बीते, भक्ति न मन में आई। स्याम-कृपा बिनु, साधु संग बिनु, कहि कौनें रति पाई।। अपने-अपने मत-मद भूले, करत आपनी भाई। कह्यौ हमारौ बहुत करत हैं, बहुतनि में प्रभुताई।। मैं समुझी, सब काहु न समझी, मैं सब इन समुझाई। भोरे भक्त हुते सब तब के, हम तौ बहु चतुराई।। हमही अति परिपक्व भए, औरनि कैं सबै कचाई।। कहनि सुहेली, रहनि दुहेली, बातनि बहुत बड़ाई।। हरि मंदिर, माला धरि, गुरु करि जीवनि के दुखदाई।। दया, दीनता, दास-भाव बिनु, मिलै न ‘ब्यास' कन्हाई।। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*              *१४६* *शरीर को भजन का साधन बनाने के लिये उसपर ध्यान रखना चाहिये*             जीवन की सफलता तो इसमें है कि मन असत् शरीर आदि के चिन्तन छोड़कर एकमात्र प्रिया-प्रियतम का ही चिन्तन करे, पर जब तक ऐसा नहीं हो जाता तब तक असत् शरीर आदि को भी भजन का साधन बनाने के लिये उसकी ओर कुछ-कुछ ध्यान रखना ही चाहिये। इसीलिये मैं चाहता हूँ कि सत्संग में रहने पर भी आपको अपने स्वास्थ्य का पूरा ध्यान रखना चाहिये ; क्योंकि जब तक शरीर में मोह है, तब तक हठ से की हुई स्वास्थ्य की उपेक्षा कभी-कभी भले सफल हो जाय, अधिकांश में पीछे बहुत ही तंग करने लगती है एवं पश्चात्ताप का भी कारण बन जाती है। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*              *१४५* *केवल इतना ही करना है*         आप वृन्दावन में जाकर भी वृन्दावन-विहारी को नहीं देख पा रहे हैं, यह सचमुच विचारणीय है। आपको वृन्दावनविहारी न दिखकर अधिक समय दिखता है संसार। यही कारण है कि जैसा आपका जीवन होना चाहिये, वैसा नहीं हो पा रहा है तथा जब तक आप पूरी दृढ़ता से अपने जीवन की धारा प्रियाप्रियतम की ओर मोड़ना नहीं चाहेंगे, तब तक कोई दूसरा ऐसा कर दे, यह सम्भव ही नहीं। यह आपको ही करना पड़ेगा। आज करें, मरते समय तक करें, कभी भी करें, करना आपको ही है। अतः अभी से सावधान होकर यह कार्य कर लें तो अनर्थक दुख, चिन्ता, फिक्र से बच जायँ। काम भी कठिन नहीं है। केवल इतना ही करना है--            १- कान से प्रिया-प्रियतम की चर्चा के सिवा दूसरा शब्द जहाँ तक सम्भव हो, बिल्कुल नहीं सुनें।                      २- आँख से प्रिया-प्रियतम के सम्बम्ध की चीजों के सिवा दूसरी वस्तु यथा सम्भव न देखें।          ...

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*               *१४४* *सच्ची इच्छा उत्पन्न होने का उपाय नाम का जप है*              मरने से पहले-पहले अपनी ओर से भगवान के चरणों मे पूर्ण समर्पण की सच्ची इच्छा अवश्य हो जानी चाहिये ; नहीं तो इससे अधिक हानि ओर कुछ भी नहीं है। ऐसी इच्छा उत्पन्न होने का इस युग मे एकमात्र उपाय है--निरन्तर भगवान् के नाम का जप। और कोई भी साधन बड़ा कठिन है। कंजूस के धन की तरह एक क्षण भी व्यर्थ मत खोइये, निरन्तर नाम लीजिए। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*              *१४३* *यही सार है--यही करना है*            जीवन का प्रत्येक क्षण प्रिया-प्रियतम के चिन्तन में बीते, इसके लिए खूब सचेष्ट रहें। इस अनमोल जीवन के समाप्त होने से पूर्व ही श्रीप्रिया-प्रियतम को मन में बसा लिया, तब तो सब कुछ कर लिया ; नहीं तो सब कुछ करके भी जीवन व्यर्थ ही समाप्त हो गया--यह सर्वथा सच्ची बात है।             भगवान की स्मृति निरन्तर बनी रहे, इसी में जीवन की सफलता है, इसी की चेष्ठा करनी है।             अनमोल जीवन को दूसरों की पापमयी बातों को देखने-सुनने में मत खोइये। दूसरे के दोषों की ओर से दृष्टि मोड़कर प्रियाप्रियतम में मन लगाइये--यही सार है।             प्रिया-प्रियतम के रूप सागर में मन को डूबा दें, मन को उस सौंदर्य-समुद्र में सर्वथा मिलकर एकमेव हो जाने दें। फिर यह संसार नहीं दीखेगा, वे ही दिखेंगे। आपकी जलन सदा के लिए शान्त हो जायगी। यही करना है, यही करना चाहिये। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाब...

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*                *१४२* *भगवान का प्रत्येक विधान कृपा से ही भरा होता है*            जीवन में एक बात कर लेने पर सारा दुःख मिट सकता है। वह बात है--भगवान् की कृपालुता पर विश्वास कर लेना। सच मानिये--जैसे सूर्य में अन्धकार देने की शक्ति नहीं, वैसे ही--विनोद की भाषा में यह कहा जा सकता है कि भगवान् में किसी का अमंगल करने की शक्ति नहीं है। उनका प्रत्येक विधान कृपा से ही भरा होता है, चाहे उसका स्वरूप बाहर से कितना भी भीषण क्यों न हो ! इसलिये आप किसी भी परिस्थिति से घबरायें नहीं। शरीर बीमार हो रहा है, यह बात बाहर से बड़ी दुःखद प्रतीत होती होगी ; किंतु इस बीमारी के पर्दे में प्रभु का कितना मंगलमय विधान काम कर रहा है--इसकी कल्पना भी आपको अथवा किसी को होनी कठिन है। इसके अतिरिक्त शरीर को जिस दिन जाना होगा, उस दिन लाख प्रयत्न करने पर भी चला ही जायगा और उस निश्चित तिथि के पहले यह कभी जायगा भी नहीं। इसलिये शरीर के जाने की चिन्ता तो सर्वथा छोड़ देनी चाहिये, बल्कि आप बराबर यह भावना करें--भगवान का जो विधान होगा, वह...

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*               *१४१*   *हृदय में निरन्तर उनके लिये आसन तैयार कीजिये*           प्रिया-प्रियतम में मन लगने में दृढ़ निश्चय की कमी है। दृढ़ निश्चय करके हृदय का द्वार उनके लिये खोलकर प्रतीक्षा कीजिये, फिर तो वे स्वयं प्रवेश कर जायेंगे। वे आपके हृदय के द्वार पर न जाने कितनी बार आते हैं, पर द्वार बंद पाते हैं, अथवा खुला भी होता है तो वे देखते हैं कि उनके लिये तो वहाँ स्थान ही नहीं है। आदि से अन्त तक, ऊपर-नीचे, बाहर-भीतर सर्वत्र संसार भरा है। फिर वे कैसे प्रवेश करें ? प्रवेश करें भी तो कहाँ ठहरें ? इसलिये आवश्यकता है कि द्वार खोल दें, अर्थात् सच्ची इच्छा मन में जाग्रत करें कि मुझे एकमात्र प्रिया-प्रियतम की आवश्यकता है, उनके अतिरिक्त मुझे और कुछ भी नहीं चाहिये तथा उनके लिये हृदय में स्थान बनाइये। हृदय में निरन्तर उनका ही चिन्तन बना रहे, निरन्तर उनके लिये आसन तैयार होता रहे। भूल जाइये इस संसार को उसके स्थान पर स्मरण कीजिये--‘कल-कल करती हुई कालिन्दी प्रवाहित हो रही हैं ; तट पर परम मनोहर दिव्यातिदिव्य एक कुस...

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*               *१४०* *श्रीकृष्ण सच्ची चाह के मोल में अपने-आपको बेच देते हैं ।*           भगवच्चरणों में पूर्णरूप से समर्पित हो जाने में ही जीवन की सार्थकता है। इसके लिये सब जगह से सभी आसक्तियों को खींचकर एकमात्र श्रीभगवान में ही पूर्ण ममत्व स्थापित करें। थोड़ा विचार करके देखें तो पता चलेगा। इस समय भी हम लोग वास्तव में आंशिक रूप से भगवान के साथ जड़े हैं। सोचिये--संसार में जो कोई भी मनुष्य आपको प्यारा लगता है, वह क्यों प्यारा लगता है ? यदि शरीर प्यारा होता तो जब इस शरीर से चेतन निकल जाता है, तब भी वह प्यारा लगना चाहिये था। पर ऐसा होता नहीं। जहाँ चेतन इस शरीर से निकला कि लोग इसे 'मुर्दा' नाम दे देते हैं, अपने प्यारे से प्यारे का शरीर भी ‘मुर्दा' हो जाता है, इसे हम लोग जला डालते हैं, नष्ट कर देते हैं, यहाँ तक कि कई तो उस शरीर से डरने लग जाते हैं। आपका शरीर भी आपको तभी तक प्यारा है, जब तक आप उस शरीर में चेतनरूप से हैं ; आप जहाँ इससे निकले कि फिर इसे बिल्कुल भूल जाइयेगा। यह चेतन, जिसके रहने से स्त्री-पुत्र, भ...

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*              *१३९* *दूसरे की ओर न देखकर आप अपने को ही सुधारिये*          आप वृन्दावन में रह रहे हैं--यह बड़ा सौभाग्य है ; पर वृन्दावन में रहकर आप दूसरों की त्रुटिरुप गंदी बातों को देखने के लिये समय क्यों लगाते हैं ? मेरी तो प्रेम भरी राय है कि जहाँ कहीं भी--जिस स्थान में,  जिस मन्दिर में बुरी बातों को देखने-सुनने का मौका मिले, वहाँ जाना आप स्थगित कर दें। सर्वत्र आपको यदि यही मिलता हो तो आप जिस मकान में हैं, उसी को प्रिया-प्रियतम का मन्दिर मानकर उसके कण-कण में उनकी भावना कीजिये। वे वहाँ हैं ही ; आपको इसलिए नहीं दीखते की आप अभी उन्हें देखना नहीं चाहते। किन्तु यदि आपका मकान कहीं त्रुटियुक्त वातावरण से भरा हो तो मैं तो यही कहूँगा कि आप वृन्दावन छोड़कर कहीं दूसरी जगह चले जाइये। बस, दूसरे की ओर न देखकर आप अपने को सुधारिये।            व्रज में रहते हुए जीवन श्रीप्रिया-प्रियतम के चरणों में न्यौछावर होना चाहिये। इसी के लिए अधिक-से-अधिक चेष्टा होनी चाहिये। प्रपञ्च की बात कम-से-कम...

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*               *१३८* *वहीं करें, जिसमें श्रीप्रिया-प्रियतम का मार्ग अधिक-से-अधिक प्रशस्त हो*            जीवन का अनमोल समय व्यर्थ न जाय। बातों-बातों में ही जीवन समाप्त होता जा रहा है। यदि प्रिया-प्रियतम के चरणों में अनुराग नहीं हुआ तो यहाँ की सारी सफलता व्यर्थ है। दूसरे बातों से अनुराग होता भी नहीं ; उसके लिये सर्वस्व त्याग करना पड़ता है। जब तक कुछ भी बचाकर रख लेने की वासना है, तब तक प्रेम की बात करना तमाशा-सा है। अतः कहना यह है कि मन-ही-मन जरा यहाँ के मोह को छोड़ने का अभ्यास कीजिये। माना, आपमें त्याग है, पर साथ ही सात्त्विक चेष्टा के नाम पर बहुत-सी ऐसी चेष्टाएँ भी आप करते रहते हैं, जिनमें आपकी शक्ति व्यर्थ खर्च होती है। अतः एकमात्र वही आपको करना चाहिये, जिससे श्रीप्रिया–प्रियतम के प्रेम का मार्ग अधिक-से-अधिक प्रशस्त हो। थोड़ी सावधानी रखें, जिससे आपके द्वारा जो व्यर्थ चेष्टाएँ होती हैं, उनमें रोक लगे।।           सारी बात इस बात पर निर्भर करती है कि श्रीप्रिया-प्रियतम की स्मृ...

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*                 *१३७* *प्रियाप्रियतम के प्रति सच्ची चाह का स्वरूप*           प्रिया-प्रियतम का अखण्ड चिन्तन करें--बस, यही सार है। अभी मन में अनेकों वासनाएँ, अनेक कर्तव्यबुद्धियाँ भरी है। सब वासनाओं के जल जाने पर ही प्रिया-प्रियतम के प्रेम की नींव खुदेगी, जीवन की धारा उनकी ओर मुड़कर यह सच्ची चाह उत्पन्न होगी-- कबै झुकत मो ओर कौं ऐहैं मद-गज-चाल।। गरवाही दीन्हें दोऊ, प्रिया नवल नँदलाल।। सिर झलत मंजुल मुट कटि लौ लट रहि छूटी। सोहत ललित लिलार पै, उभै भौंह की जूटि।। ता मधि बेंदी रतन की, गर मुकता की माल।। नैन छकौंहे कछु अरुन, सुंदर सरस बिसाल।। कुंडल-झलक कपोल पर, राजति नाना भाँति।। कब इन नैननि देखिहौं बदन-चंद की कांति।।            अभी तो, सच पूछें, भजन की नकल भी नहीं पूरी हो रही है। बस, उनकी कृपा की बाट देखते रहिये।          *           *          *               स...

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*               *१३६* *शरीर के लिये संयम, पथ्य एवं औषध की व्यवस्था रखनी ही चाहिये।*          शरीर क्षण-क्षण विनाश की ओर ही बढ़ रहा है, यह प्रत्यक्ष है, पर विनष्ट होने से पूर्व इसे यथासम्भव इस अवस्था में अवश्य रखना चाहिये कि यह अपने में रहने वाले मन को प्रिया-प्रियतम की ओर बढ़ते समय कहीं अद्विग्न न कर दे। मन जिस क्षण वास्तव में प्रिया-प्रियतम को पकड़ लेगा, उस समय तो इसकी सँभाल की आवश्यकता नहीं रहेगी ; सँभाल करेगा भी कौन ? सँभाल करता है मन ; किंतु वह तो प्रिया-प्रियतम से जा जुड़ा। अतः उस परिस्थिति में तो शरीर का जो होना होगा, हो ही जायगा। पर उससे पूर्व शरीर के लिये संयम, पथ्य एवं औषध की व्यवस्था रखनी ही चाहिये। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*              *१३५* *महावाणी के पाठ का अधिकारी*           महवाणी के पाठ का वास्तविक अधिकारी वह है, जिसके मन में  स्त्रीसम्भोग की भावना सर्वथा समाप्त हो गयी हो, जो कामविकार से सर्वथा मुक्त हो गया हो। महावाणी एक परम दिव्य ग्रन्थ है। बिना अधिकारी बने जो उसका पारायण करता है, उसके जीवन मे पतन की आशंका विशेष है। प्रियाप्रियतम उनकी रक्षा करें। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*             *१३४* *भगवच्चिन्तनकी चेष्टा कीजिये, सफलता मिलेगी।*           खूब मौज से श्रीकृष्ण का निरन्तर चिन्तन कीजिये। सब काम एक तरफ तथा भगवच्चिन्तन एक तरफ। मन से निश्चय करके चिन्तन की चेष्टा कीजिये, तब चिन्तन में सफलता मिलेगी। अन्यथा जब तक भगवान के चिन्तन के समान कोई भी दूसरा काम लाभकारी दीखेगा, तबतक मन भगवान को छोड़कर उस काम की ओर ही झुकेगा ; क्योंकि अनादिकाल से अन्य-अन्य विषयों में ही मन को स्वाद मिलता रहा है, भगवच्चिन्तनका स्वाद उसे ठीक से कभी नहीं मिला। मिला होता तो फिर तो भगवच्चिन्तन के सिवा दूसरा काम मनसे होता ही नहीं। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*              *१३३* *युगल-सरकार को चित्त में बसाइये*          युगल-सरकार को चित्त में बसाइये--जीवन का यही परम लाभ है। समय विद्युत की भाँति आपके देखते-देखते आपको छोड़कर भाग रहा है। गिनती के श्वास एक-एक करके कम होते जा रहे हैं। अब समय नहीं है कि आप किसी भी अन्य प्रपञ्च में तनिक भी मन लगायें। वाणी प्रिया-प्रियतम के मधुर नामका उच्चारण करे, कान उनके लीलामृत का पान करें एवं नेत्रों के सामने युगलछबि निरन्तर बनी रहे--बस, यही अभ्यास करना है तथा प्राणों की शक्ति लगाकर करना है। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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*आस्तिकता की आधारशिलाएँ*              *१३२* *आप चाहें तो निश्चिन्त हो सकते हैं*            खूब नाम लीजिये तथा भगवान की कृपा का दर्शन प्रत्येक परिस्थिति में कीजिये। भगवत्कृपा एवं नामजप आश्रय लेकर निश्चिन्त हो जाइये। आप चाहें तो निश्चिन्त हो सकते हैं ; आपके चाहने भर की देर है। आपने चाहा तो नाम के रूप में भगवान् बिना किसी परिश्रम के ही जीभ पर नाचने लगेंगे, उनकी कृपा का प्रवाह बह जायगा। स्वयं निहाल हो जायँगे तथा बहुतों को निहाल करेंगे।            नाम अधिक-से-अधिक जपिये, इतनी प्रार्थना है। श्रीकृष्ण बड़े दयालु हैं, लेकिन परीक्षा भी अवश्य करते हैं। साथ ही उनके दरबार से कोई निराश नहीं लौटता, यह बात भी भूलनी नहीं चाहिये। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*              *१३१* *आप अपना भवन बुहारिये*              सनातन आचार का पालन करते हुए ही आप प्रिया–प्रियतम का अखण्ड स्मरण कीजिये। दूसरे बनते हैं या बिगड़ते हैं, इसका ठेका आपको श्रीकृष्णने दिया हो तो फिर तो उनकी सँभाल करनी चाहिये ; पर यदि ठेका नहीं दिया है तो यह दोहा याद कीजिये-- तेरे भाऐं जो करौ, भलौ–बुरौ संसार।। ‘नारायन' तू बैठि कै, अपनौ भवन बुहार।। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*             *१३०* *भगवान के समर्पित वस्तु का महत्व*           जो व्यक्ति भगवान के चरणों मे समर्पित हो जाता है, उसकी दृष्टि में अपने केवल भगवान ही होते हैं एवं जो कुछ भी बचा रहता है, वह भगवान का ही होता है। उस अवस्था में उसके लिए मेरी माँ, मेरे बाप, मेरे भाई कुछ भी नहीं रहते। परन्तु जो व्यक्ति अपने आपको उससे (भगवान के समर्पित व्यक्ति से) सम्बन्ध मानता है, वह बड़ा भाग्यवान है ; क्योंकि भगवान को समर्पित हुई वस्तु से सम्बन्ध रखने वाली वस्तु भी स्वाभाविक ही भगवान को समर्पित हो जाती है और उस पर भगवान का विशेष अधिकार होता है। अवश्य यह बात तभी लागू पड़ेगी, जब कोई व्यक्ति अपने आपको हृदय से उससे (भगवान के समर्पित भक्त से) सम्बन्ध बनाता है। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जु ।।*

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*            *१२९* *व्रज की रज में रहकर सारी चिन्ता भूल जाइये*            आप लिखते हैं--श्रीवृन्दावन निजधाम में रहते हुए भी मेरे मन में न जाने कितने पाप भरे हैं, कुछ भी असर होता नहीं। बात ठीक है ; पर चिन्ता क्यों करते हैं ? राधारानी के घर में रहकर चिन्ता क्यों ? राधारानी की प्यारी भूमि में रह रहे हैं--भला, यह कम सौभाग्य की बात है ? बस, इसी सौभाग्य को याद करते हुए आनन्द में मस्त रहिये। चाहे कुछ न हो, उस परम पवित्रतम सच्चिदानन्दमयी भूमि की रज में रहकर सारी चिन्ता भूल जाइये।       आप ब्रज में बसते हैं, राधारानी की अपार कृपा से ही व्रजवास मिलता है। पर जैसे शरीर ब्रज में है, वैसे मन का अणु-अणु व्रजकिशोरी एवं व्रजकिशोर में रम जाय, इतनी चेष्टा और करें। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*                *१२८* *अन्य के लिये स्थान न रहे*              पढ़ने-सुनने का सार इतना ही है कि नेत्रों में, मन में, प्राण में प्रिया-प्रियतम बस जायँ, अन्य के लिये तनिक भी स्थान न रहे। *प्रीतम छवि नैनन बसी, पर छबि कहाँ समाय।।* *भरी सराय ‘रहीम' लखि, आपु पथिक फिरि जाय।।*            सराय (धर्मशाला) में तिल रखने का भी स्थान न देखकर जैसे नया यात्री वहाँ से हटकर दूसरी धर्मशाला की खोज में चला जाता है, वैसे ही नेत्र, मन,प्राण सर्वत्र प्रिया–प्रियतम को भरा देखकर विषय अपने-आप हट जायँ, इसके लिये प्रयत्न करें। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*               *१२७* *'नींद तोहि बेचूँगी, आली !*     एक भक्त का पद है, जिसकी प्रथम पंक्ति है--  *‘नींद तोहि बेचूँगी, आली ! जो कोई गाहक होय।*             इस पर विचार करें। प्रेमरसभावितमति व्रजसुन्दरियाँ अपना व्यावहारिक ज्ञान यहाँ तक खो बैठती हैं कि उन्हें प्रतीत होने लगता है--नींद भी खरीद-बिक्री की एक वस्तु है। वास्तव में तो तमोगुण से उत्पन्न होने वाली निद्रा श्रीकृष्ण की स्वरूपभूता ब्रजसुन्दरियों को स्पर्श ही नहीं कर सकती। अपने प्रियतम श्रीश्यामसुन्दर के चिन्तन में वृत्तियों के सर्वथा तन्मय हो जाने पर वे आत्मविस्मृत हो जाती हैं, इस आत्मविस्मृति को ही वे निद्रा मान लेती हैं। सुषुप्ति की भाँति अज्ञान में उनकी वृत्तियाँ लीन हों, ऐसी उनकी निद्रा नहीं। उनकी चित्तभूमि में तो सोते समय भी नित्य-निरन्तर अखण्ड श्रीकृष्ण स्फुरण होता ही रहता है-- *चलत, चितवत, दिवस जागत, सुपन सोवत रात।।* *हृदय तें वह स्याम मूरति छिन न इत–उत जात ।।*             ऐसी अनोखी निद्रा में ही...

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*             *१२६* *सन्तके साथ शुद्ध पारमार्थिक सम्बन्ध ही रहे*           जीवन का उद्देश्य यदि भगवान हैं तो फिर किसी भी जागतिक प्रलोभन में नहीं भूलना चाहिये। भगवान श्रीकृष्ण ने राजा मुचुकन्द को स्वयं प्रलोभन देकर जाँचा ; किन्तु मुचुकन्द ने भगवान की ही दया से भगवान को लिया, भोगों को नहीं। उसी प्रकार सन्त के साथ सर्वथा शुद्ध पारमार्थिक सम्बन्ध ही रहे। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*             *१२४* *अपने भविष्य को सदा निर्मल देखो*             सन्तों के वचन हैं-'मालिक हैं साहिब सीताराम, सोच मन काहे को करे।' बस निश्चिन्त रहिये। एक बहुत ऊँचे महात्मा ने कहा है--'अपने भविष्य को निर्मल देखो। सोचो कि प्रभु तुम्हें अवश्य मिलेंगे, चाहे तुम कितने ही अधम क्यों न होओ।' हम लोग भी ऐसे ही सोचें। सचमुच अपना भविष्य मलिन सोचना भगवान की अपार दया का अपमान करना है। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*                *१२५* *भगवान् के कृपामय स्पर्श की प्रतीक्षा कीजिये*            एक बात ध्यान में रहनी चाहिये कि यदि लेशमात्र भी आकर्षण भगवान् के अतिरिक्त किसी और जगह होता है तो समझ लेना चाहिये, हम भगवान के शरण हुए ही नहीं। वास्तविक शरणागति हो जानेपर आसक्ति का सर्वथा अभाव हो जाता है। किंतु घबराना नहीं चाहिये। जिस दिन साधक की यह अभिलाषा हृदय से सम्बद्ध हो जाती है, उसी क्षण भगवान् शरणागति स्वीकार कर लेते हैं। एक बात और है। जिस पर भगवान की अत्यधिक कृपा होती है, जिसे भगवान् अपने पास बुलाना चाहते हैं, वस्तुतः वही इस मार्ग में वाचिक शरणागति भी ग्रहण करता है। देखें, आपकी इच्छा पूरी भी हो सकती है और नहीं भी पूरी हो सकती ; किंतु यह वाचिक शरणागति एक दिन उन्हीं की दया से सच्ची शरणागति में परिणत हो जायगी। आप भगवान् की दया का अलौकिकता का अंदाज नहीं लगा सकते। मानवी बुद्धि भगवान की दया कैसी होती हैं, इसको नहीं समझ सकती। यही कारण है कि अपने माप (स्टैंडर्ड) से ही हम भगवान को जाँचते हैं और दुःखी रहते हैं। अतः सब ...

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*                 *१२३* *कृपा के लिये श्रीजी के चरणों का चिन्तन करें।*              'श्रीजी की मुझ पर कृपा है, इसका अनुभव कैसे हो'--इसका उपाय आपने पूछा है। मेरी समझ में इसका सर्वोत्तम उपाय है--श्रीजी के चरणों का निरन्तर चिन्तन। मन श्रीजी के चरणों में चिपककर ही श्रीजी की कृपा का अनुभव कर सकता है। अत्यन्त प्रेम से ‘राधे-राधे' कहते हुए श्रीराधा रानी के चरणों में मन को लीन कर दें। फिर ऐसी कृपा का अनुभव होगा कि आप निहाल हो जायँगे। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*                *१२२* *श्रीकृष्ण के प्रति आसक्ति बढ़ाइये*           पाँच-पाँच मिनट पर भगवत्स्मरण की चेष्टा करते हैं, पर भूल हो होती है तो इस विषय मे यह निवेदन है कि भूल होती है तो होने दें, पर चेष्टा करते ही चले जायँ। जब तक श्रीकृष्ण प्यारे नहीं लगते, तब तक भूल होगी ही। यह नियम है, सबसे प्यारी चीज भूलती ही नहीं। श्रीकृष्ण से अधिक प्यारी चीज और कोई होगी, जिसके लिये श्रीकृष्ण को भूल जाते हैं। श्रीकृष्ण को याद करते-करते अपने-आप सब आकर्षण फीका पड जायगा और वे सबसे प्रिय लगने लगेंगे। फिर भूल नहीं होगी।                    भावपूर्ण पुकार सच्चे मन से नहीं होती, यह ठीक है, पर इससे यह स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण की अभी पूरी आवश्यकता नहीं प्रतीत हुई है। प्यासे को पानी की पुकार के लिये कहीं सीखने नहीं जाना पड़ता, अपने-आप पुकार होती है; क्योंकि पानी उसके लिये अत्यन्त आवश्यक वस्तु है। वैसे ही श्रीकृष्ण जिस दिन परमावश्यक वस्तु बन जायेंगे, उस दिन सच्चे मन से उनके लिये पु...

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*                   *१२१* *जगत के समर्थन की चिन्ता न कीजिये*          कलियुग प्रभाव जैसे-जैसे बढ़ेगा, वैसे-वैसे भगवान में विश्वास करने वालों की संख्या कम होती जाएगी। भगवद्-विश्वासी पुरुष मूर्ख समझे जायँगे। उन लोगों की सत्यमूलक चेष्ठाओं का आदर तो दूर रहा, वरं निन्दा होगी। इसलिए 'जगत के लोग मुझे क्या कहेंगे'--इस बात की ओर से दृष्टि कम कर लेनी चाहिए। यदि हमें कोई बात सत्य दीखे और उसका ही आचरण भगवदिच्छानुकूल प्रतीत हो तो वैसे ही करना चाहिए। जनसमुदाय की दृष्टि से भी आदरणीय अवश्य है, यदि भगवदिच्छानुकूल हो ; पर अपनी नीयत में जो चेष्टा प्रभु को प्रसन्न करने वाली जँचे, उसका समर्थन सर्वसाधारण के द्वारा न होने पर भी अवश्य करना चाहिये। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*               *१२०* *भगवान को जीवन में मुख्य वस्तु बनाइये !*           जो हो रहा है, वह ठीक हो रहा है--यों समझकर सदा निश्चिन्त रहना चाहिये। एक क्षण के लिये भी अपना लक्ष्य नहीं भूलना चाहिये। मुझे इस जीवन में भगवान के पास पहुँचना है--अगर इस बात को कभी न भूलेंगे, तो फिर अपने-आप जीवन की सारी चेष्टाएँ भगवान के लिये होने लगेंगी। वस्तुतः यहाँ का कोई भी पदार्थ हमें इसलिये साथ में रखना चाहिये कि उसके सहयोग से भगवान् के मार्ग में अधिक-से-अधिक बढ़ा जा सके। जो पदार्थ हमें भगवान से अलग हटाता हो, वह तो सर्वथा त्याज्य है, चाहे वह कितना ही प्रिय क्यों न हो। यह कोई पढ़-सुन लेने की बात नहीं है, भगवान के इच्छुक भक्तों को सचमुच इसका क्रियात्मक प्रयोग करना पड़ता है। अवश्य ही भगवान् परम दयालु हैं और वे अपने ऊपर निर्भर करने वाले भक्त की सब प्रकार सहायता ही करते हैं, किंतु कभी-कभी प्रेम-परीक्षा के लिये ऐसा अवसर भी मिला देते हैं, जब भक्त को एक ओर भगवान् और दूसरी ओर प्रलोभन--इन दोनों में से किसी एक पथ को चुनना पड़ता है। भगवान क...

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*आस्तिकताकी आधार-शिलाएँ*                 *११९* *निराश न होकर भगवान की ओर बढ़ चले*             बिल्कुल निराश न होकर श्रीभगवान की ओर बढ़ चले। सचमुच बढने की इच्छा रखने वाले को प्रभु बुला लेते हैं। जगत के किसी हेर-फेर से चकित होने की आवश्यकता नहीं। जो कुछ होता है, भगवान् का रचा हुआ होता है। आपके न चाहने पर भी पर भी वह होकर ही रहेगा। उसे कोई टाल नहीं सकता। इसलिये यहाँ से अपनी दृष्टि सर्वथा मोड़ लेनी चाहिये और अधिक-से-अधिक भगवान् का चिन्तन करना चाहिये। अन्यथा इस जगत को देखकर कभी हँसना और कभी रोना पड़ेगा ही।           एक बात और है। जहाँ तक हो, प्रपञ्च के काम में कम पड़ियेगा ; नहीं तो भगवान् गौण हो जायँगे और प्रपञ्च मुख्य।          भगवान्का नाम यदि नहीं भूले तो सब ठीक हो जायगा। यही सबसे मुख्य बात है। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*              *११८* *जगत की परिस्थितियों के हेर-फेर को खेल समझकर खेलते चले जाइये।*             आप शिक्षक हैं और विद्यालय की स्थिति बड़ी विचित्र है, यह माना ; परन्तु विद्यालय ही क्या आपको चाहिये सारे जगत की परिस्थितियों के हेर-फेर को बिल्कुल गौणतम कर दें। भगवान् ने जैसे रच रखा है, वही होगा और उसमें सबका मंगल है। सिनेमा-हाउस में जिस प्रकार रील घूमती रहती है और एक-पर-एक दृश्य बदलते रहते हैं, उसी प्रकार विश्वास रखियेगा कि फिल्म घूम रही है। एक के बाद एक दृश्य आ रहे हैं। बस, इन्हें खेल समझकर देखते चले जाना चाहिये। खूब विश्वास रखिये--जिस फिल्म के ऑपरेटर, संचालक, मैनेजर मंगलमय भगवान् हैं, उसका पर्यवसान किसी के न चाहने पर भी जो होने वाला है, वह होकर ही रहेगा। फिर चिन्ता क्यों करें। चिंता तो, बस, हरिनाम की करनी है। यह बातें केवल कथनमात्र की नहीं है। मनुष्य भगवान पर विश्वास करके इन्हें अनुभव कर सकता है। अतएव किसी भी प्रकार को परिस्थिति में किचिंतमात्र भी विचलित न होकर भगवान की ओर ही बढ़ने की चेष्टा करें। ...

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*              *११७* *मन से एवं मानसिक देह से अपने प्रियतम की सेवा कीजिये*             भगवान के चरणों की साक्षात् नित्य सेवा जिस देह से होती है, वह देह आपको प्राप्त नहीं है। यह देह पाञ्चभौतिक है, नश्वर है, मल-मूत्र से भरा है, गंदा है। इसकी ओर उपराम हो जाइये। लालसा कीजिये उस देह की,जिसको पाकर नित्य-निरन्तर उनके चरणों में बैठकर उनकी सेवा का सौभाग्य प्राप्त हो। जब तक वह देह नहीं मिलती, तब तक वाणी से, मन से एवं मानसिक देह से उनकी सेवा कीजिये, बड़ी लगन से कीजिये। वही आपका असली धन है। वाणी से प्रियतम का नाम लीजिये, मनसे लालसा कीजिये तथा उस देह की ओर ध्यान रखिये एवं अभ्यास कीजिये कि मन का प्रत्येक संकल्प उनकी सेवा की भावना से सना हुआ हो। उनकी कृपा का आश्रय करके अपनी पूरी ताकत लगा दीजिये। वे देखेंगे और आपकी व्याकुलता देखकर उनके हृदय में अनुराग की लहरें उठने लगेंगी--उनके हृदय में चाह होने लगेगी आपसे मिलकर आनन्द लेने की और आप निहाल हो जायँगे। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*              *११६* *कम-से-कम बोलकर काम चलायें और शेष समय मशीन की तरह भगवान का नाम लें*     श्रीसीताजी की अवस्था का वर्णन करते हुए हनुमान जी महाराज कहते हैं-- *नाम पाहरू दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट ।* *लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहि बाट।।।* (मानस ५/ ३०)     'रात-दिन नाम का पहरा लगा हुआ है, ध्यान के किवाड़ बंद हैं एवं अपने ही चरणों में नेत्रों का लगा रहनारूप ताला बंद है, इसीलिये श्रीसीताजी के प्राण नहीं निकल पा रहे हैं।'             यह गोस्वामी तुलसीदासजी की कोरी कल्पना नहीं है,  श्रीरामजी के विरहमें श्रीसीताजी की वास्तविक अवस्था का वर्णन है। श्रीभगवा्न ने अपनी हाल्दिनी शक्ति के द्वारा यह आदर्श स्थापित करवाया कि हमसे बिछडे भक्त की यही दशा होनी चाहिये। आप भी प्रभु से बिछुड हुए हैं, अतः आप भी इस दशा को प्राप्त करने की सुन्दरतम अभिलाषा को लेकर नाम का पहरा लगा दीजिये। कंजूस के ध्यान की तरह वाणी का संयम कीजिये। अनावश्यक बिल्कुल मत बोलिये। काम के लिये बोलते समय भी यह ध्यान ...

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*              *११५* *निराश मत होवें, भगवान् की कृपा की बाट देखते रहें*             आपको अपनी स्त्री आदि की बीमारी की चिन्ता है, सो स्त्री आदिके सम्बन्ध में यह बात विचारना चाहिये कि  मंगलमय के विधानके अनुसार जो होना है, वही होगा। उनकी मृत्यु में हमारा मंगल होगा तो मृत्यु आकर ही रहेगी और संयोग से मंगल होगा तो संयोग में कभी नहीं तोड़ेंगे। इसके अतिरिक्त ज्योतिष के निर्णय से अल्पायु एवं दीर्घायु का ठीक-ठीक पता चलना आजकल कठिन है। ज्योतिष शास्त्र ठीक है, पर उसके जानने वाले आज के बहुत कम हैं। सबसे मुख्य बात यह है कि भगवान के विधान को जाना भी नहीं जा सकता। यह सोचकर इस विषय में आपको निश्चिन्त ही रहना चाहिए। आर्थिक प्रश्न को लेकर मन में चिन्ता होनी भी स्वाभाविक है। साथ ही आप जैसे वातावरण में रह रहे हैं, उसमें भगवान् पर विश्वास की शिथिलता होना कोई आश्चर्य नहीं है। पर आप मन में इस बात को निश्चय कर लें कि यह बात सर्वथा प्रारब्ध से सम्बन्ध रखती है। प्रत्येक प्राणी का प्रारब्ध अलग-अलग है। सुख-दुःख जैसे, जिसके...

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*             *११४* *व्यवहार जैसेे है, वैसे ही रहे; मन में केवल उनका ही आसन रहे*       पूरी चेष्ठा कीजिये, मन से और सभी आसक्तियाँ मिट जायें। खूब गम्भीरता से विचारें और बार-बार स्त्री आदि के प्रति मेरा प्रेम होने का क्या कारण है? इसमें एक बडी सुन्दर रहस्य की बात है। आप विचारें--आपका प्रेम आपकी स्त्री आदि की चेतन आत्मा से हैं अथवा उसकी देह से? यदि देह से प्रेम होता, तो मरने के बाद शरीर चेतन आत्मा के निकल जाने के बाद भी उसे रहना चाहिये, पर सच मानिये, यदि आप कहीं जीवित रहें और आपकी स्त्री आदि में किसी की मृत्यु हो गयी और उसके बाद यदि कोई आपको उस कमरे में अकेले रहने के लिये कहे तो डर लगेगा। आप शायद नहीं रहियेगा। ऐसी बात क्यों होती है ? इसलिये कि अब उस में भगवान् का जो चेतन अंश था, वह नहीं रहा। भगवान का अंश निकल जाने पर वह चीज इतनी भयावनी हो गयी कि अब उसके पास बैठने में भी लगता है। उनका अंश जब तक था, तब तक यह चीज प्रिय थी। अब सोचे, उनके अंश को लेकर ही तो आप इतने फँस रहे हैं। यदि स्वयं अंशी पूर्ण रूप से प्राप्त हो जाय तो कितन...

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*           *११३* *भगवान से मनको जोड़िये*          आपका मन जिन-जिन पदार्थों का चिन्तन करता है, उनसे कितने दिनों का सम्बन्ध है, जरा विचारें। इस देह के धारण करने के समय से ही तो उनका सम्बन्ध हुआ है। अतएव एक सीमित समय के चित्र बार-बार मन में उलट-पलट करके आते हैं और किसी से राग होता है, किसी से द्वेष होता है ; किसी को आप अपना मानते हैं, किसी को पराया; किसी से दु:खी होते हैं, किसी से प्रसन्न होते हैं--यही भूल है। हम लोगों को इसी को मिटाना है। इन सब स्थानों से मन को निकालना है और सबके बदले केवल एक भगवान का चिन्तन करना है। हमारे चिन्तन का जितना स्थान भगवान् ग्रहण करेंगे, उतना अंश विषयों से रहित होगा। जिस दिन केवल भगवान्–ही–भगवान् रहेंगे, उस दिन संसार पूर्ण रूप से निकल जायगा। हम लोग अभ्यास करें, चेष्टा करें मन को निरन्तर भगवदाकार बनाने की। पहले विश्वास करें--‘इस जगत में सुख नहीं है, फिर प्रतीति होने पर विचार के द्वारा निश्चित करें--यहाँ सुख नहीं है। इस प्रकार निरन्तर--'यहाँ इस जगत् में सुख नहीं है, इस भावना को दृढ़ करते ह...

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*              *११२* *संसार से मनको हटाकर भगवान् में लगाइये*            एक बात खूब ध्यान में रखने की है--भगवान के मार्ग में बढ़ने वाले को साथी नहीं खोजना चाहिये। साथ मिल जाय, ले लें, किंतु साथ की अपेक्षा न रखें। खासकर आजकल कलियुग के भीषण वातावरण में संसार के गर्त से निकालने में सहायता देने वाले साथी बहुत कम मिलते हैं।                   काल के प्रवाह में आज जिसे मनुष्य अपना कहता है, वे सब-के-सब छिन्न-भिन्न हो जायेंगे। आप ही सोचें--इस जन्म के पहले भी तो आप कहीं थे, परिवार भी होगा; किंतु आज उसकी स्मृति तक नहीं है। वे भूखे मर रहे होंगे तो भी आपको उनका पता नहीं। इसी प्रकार मृत्यु वर्तमान परिवार को स्मृति भी नष्ट कर देगी। पर मोहवश मनुष्य विचारता नहीं। तात्पर्य यही है--संसार से मन को हटाकर भगवान् में लगाना चाहिये। समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। किंतु हताश भी होने की जरूरत नहीं है। कृपामय का आश्रय जिसने वाणी से भी ले रखा है, उसका भी उद्धार वे करेंगे ही। फिर जो ...

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*           *१११* *अपने आपको सर्वथा उन पर छोड़ दीजिए*           भगवान क्या, कब, कैसे करते हैं--इसे कोई नहीं जानता। वे क्या हैं, इस बात को वस्तुतः वे ही जानते हैं। पर आजतक जितने ऊँचे-ऊँचे सन्त हो गये हैं और हैं, उन्होंने अनुभव किया कि वे हैं और जो कुछ करते हैं, वही ठीक है; उसी में प्रत्येक जीवन का अनन्त मंगल है। उनसे कुछ भी न चाहकर अपने आपको सर्वथा उन पर छोड़ देना चाहिये। अतः आप भी अपने आपको सर्वथा उन पर छोड़ दीजिये। अपनी ओर से केवल इतनी चेष्टा करें कि जीभ के द्वारा निरन्तर नाम-जप हो ; उसी में आनन्द मानिये। इतनी बात अवश्य देख लें कि अपनी ओर से सारी शक्ति लगा दी जाय। *परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

110

*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*            *११०* *जिस क्षण आपका हृदय कातर हाकर रोने लगेगा, उसी क्षण प्रभु सुन लेंगे*          आप भगवान की यह बड़ी भारी कृपा समझे कि आसक्ति आपको आसक्ति के रूपमें दीख रही है। इसका मिटना भगवत्कृपासापेक्ष है। प्रयत्न से यह कम होती है, पर इसके नाश का सर्वोत्तम उपाय है--भगवान के सामने सच्चे हृदय से प्रार्थना जिनके एक संकल्प से विश्व का निर्माण हो जाता है और संकल्प छोड़ते ही सब नष्ट हो जाता है, वे यदि चाहें तो उनके लिये आपके इस दोष का नाश कितनी तुच्छ बात है--यह आप सहज में अनुमान लगा सकते हैं। अर्न्तहृदय की करुण प्रार्थना के द्वारा आप उनमें चाह उत्पन्न कर दें। ठीक मानिये, यदि आप सच्चे हृदय से इस दोष का नाश चाहने लग जाँय तो प्रभु को अवश्य ही दया आ जायगी और क्षण भरमें उनकी कृपा से सारे दोष मिटकर आपका मन उनमें लग जायगा। आप चाहते नहीं हों, यह बात नहीं है, पर अभी चाह बहुत मन्द है। प्रार्थना करते-करते जिस क्षण सचमुच इन दोषों के लिये हृदय में जलन पैदा हो जायगी और आपका हृदय कातर होकर रोने लगेगा, उसी क्षण प्रभु सुन लेंगे। अ...

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*         *१०९* *भगवान् पर निर्भर होने की चेष्टा कीजिये*        अधिक-से-अधिक भगवान पर निर्भर होन की चेष्टा कीजिये। सबसे निरापद एवं पतन के भय से सर्वथा शून्य यह मार्ग है। इसपर दृढ़ विश्वास करते रहना चाहिये--भगवान हैं वे हमारे हैं और हमारा मंगल ही करते हैं।          अपनी पसंदगी मन से सर्वथा निकाल दीजिये। हमारी बुद्धि प्राकृत है अज्ञान से भरी हुई है  पापों के संस्कार से मलिन है, बहुत कम दूरी की बात सोचती है। बहुत बार हम लोग उस बात में अपना मंगल मान लेते हैं, जिस बात से हमारी अत्यन्त हानि होने वाली होती है, पर भगवान की बुद्धि भगवन्मयी है, वहाँ भूल होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। वे हमारे लिये जो कुछ भी सोचते हैं, या सोचेंगे, उसमें हमारा अनन्त मंगल है और उन्हीं की पसन्दगी हमारी पसंदगी होनी चाहिये। भगवान पर निर्भर करने वाले भक्त को यह सदा के लिये मान लेना चाहिये कि उन्होंने (भगवान) जिस परिस्थिति में हमें रखा है, वही उन्हें (भगवान )को मंजूर है। यदि उन्हें मंजूर न होती तो परिस्थिति अवश्य बदल जाती। ऐ...

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*          *१०८* *अंतःकरण की स्वच्छता के तारतम्य से ही सत्य के प्रकाश का तारतम्य होता है*           महात्मा लोगों से आपने कितनी बार सुना होगा---'अणु-अणु में प्रभु विराज रहे हैं, ऐसी कोई जगह नहीं है, जहाँ वे न हों।  महात्मा लोग केवल ऐसा कहते हैं, ऐसी बात नहीं है, उन्हें अणु-अणु में प्रभु के दर्शन होते हैं। पर क्या हम लोग उनके इस कथन का पूरा-पूरा मर्म ग्रहण कर पाते हैं ? यदि ग्रहण कर पाते तो तत्क्षण हमें भी अणु-अणु में प्रभु का दर्शन होने लग जाता। ऐसा क्यों नहीं होता ? अर्थात् अणु-अणु में प्रभु हैं--इस कथन का मर्म ग्रहण होकर प्रभु का दर्शन क्यों नहीं होने लग जाता ? इसका वास्तविक कारण तो प्रभु जाने पर महात्मा लोग स्थूल कारण बतलाते हैं कि अन्तःकरण में सामर्थ्य नहीं है कि वह सत्य के मर्म को ग्रहण कर सके। अन्तःकरण मलिन है।अंतःकरण की स्वच्छता के तारतम्य से ही सत्य के प्रकाश का तारतम्य हो जाता है। सत्य वस्तु एक होते हुए भी ग्रहण-शक्ति के तारतम्य से अनुभव का भी तारतम्य हो जाता है। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*        *१०७* *जागतिक प्रेम का पर्यवसान श्रीभगवान में होना चाहिये।*      जिस प्रेमसे हम लोगों ने अपने जीवन के इतने दिन बिताये, उस प्रेम का पर्यवसान श्रीभगवान में होना चाहिये, तभी वास्तविक रूप में हम लोगों के प्रेम की सार्थकता है। जगत में किसी के प्रति भी यदि हमारा प्रेम है, किंतु बीच में भगवान् नहीं हैं, तो वस्तुतः वह प्रेम दुःखान्त ही होता है। जगत् में आज इतना दुःख, दैन्य, निराशा, विश्वासघात, स्वार्थपरता और नृशंसता आदि इसलिये ही बढ़ रहे हैं कि श्रीभगवान से रहित चेष्टा होने लगी है, अर्थात् किसी भी चेष्टा का तात्पर्य भगवान की प्रसन्नता नहीं है। भगवत्प्रसन्नता की बात तो दूर, ‘भगवान् हैं' --यह विश्वास भी अधिकांश मनुष्य खोते चले जा रहे हैं। ‘प्रेम' के नाम पर आत्मेन्द्रिय-प्रीति की वासना काम करती है। इसलिये हम लोगों को इस सम्बन्ध में बहुत सावधान रहने की जरूरत है। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*         *१०६*   *निराश होना प्रभु के प्रेम का तिरस्कार करना है।*              प्रभु की बड़ी कृपा है; सच मानिये, हम लोग उनकी कृपा में स्नान कर रहे हैं डूबे हुए हैं। फिर घबराये क्यो ? यह बात बिल्कुल याद रखने की है कि एक क्षण के लिये भी निराश होना, अर्थात् ऐसा सोचना कि 'मेरा क्या होगा' उनकी कृपा का-- उनके अहैतुक प्रेम का तिरस्कार करना है। यह कहना हो सकता है मैं उन्हें प्रभु मानता तो बात ठीक थी, पर मैं तो उन्हें प्रभु ही नहीं मानता। प्रभु मानकर उनके आश्रित ही नहीं हूँ, फिर वे मुझे क्यों सँभालेंगे ? बहुत ठीक, पर उन्होंने स्वयं गीतामें कहा है-- *सुहृदं सर्वभूतानाम्*-- सब भूतों का सुहृद हूँ। क्या हम भूतों की श्रेणी में नहीं हैं। यदि वे *'भजतां सुहृदम्'* भजन करने वाले के सुहृद' होते तो हमारे लिये ही निराशा की बात थी, पर वे तो स्पष्ट कहते हैं कि मैं सब प्राणियों का सुहृद हूँ। केवल भजन करने वालों का ही नहीं। फिर उन परम सुहृद को, जो सर्वलोकमहेश्वर भी है, हमारी सुधि नहीं होगी ? अवश्य होगी, ऐसा दृढ विश्वास करे; यह ...

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*             *१०५* *मृत्यु सच्चे प्रेमियों के लिये स्वागत की वस्तु होती है।*           मृत्यु का नियन्त्रण करने वाले श्रीभगवान् हैं, जो किसी का कभी भी अमंगल नहीं करते। उनकी भेजी हुई मृत्यु हमें अमंगल दीखती है, किंतु उसकी आड़ में हमारा कितना मंगल है--इसकी कल्पना हम नहीं कर सकते। हाँ, यदि हम चाहें तो हम स्वयं मृत्यु का आनन्द ले सकते हैं। जो मृत्यु जगत के लिये अत्यन्त भयानक है, वही सच्चे प्रेमियों के लिये, प्रभु के प्रियजनों के लिये अत्यन्त स्वागत की वस्तु होती है, क्योंकि मृत्यु उन्हें अपने प्रियतम प्रभु के अत्यन्त निकट पहुँचा देती है। अवश्य ही कहना-सुनना बड़ा आसान है, वास्तविक मृत्युको इस रूप में स्वीकार करना थोड़ा कठिन है। किंतु भगवान की कृपा से असम्भव कुछ भी नहीं--यह बात भी भूलनी नहीं चाहिये। अन्तिम बात यही है--हम सब लोग भजन करें। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*              *१०४* *हम कहीं भी रहें, किसी भी अवस्था मे रहें, भजन को पकड़ें*         माता देवहूति जी कहती हैं--- *अहो बत श्वपचोअ्तो गरीयान् यज्जिह्वग्रे वर्तते नाम तुभ्यम्।* *तेपुस्तपस्ते जुहुव: सस्नुरार्या ब्रह्मनूचुर्नाम गृहन्ति ये ते।* (श्रीमद्भा. ३/३३/७)                        'बड़े आश्चर्य की बात है--जिसने तुम्हारा नाम लिया, उसने सारी तपस्या कर डाली, हवन कर लिए, तीर्थ स्नान कर लिया, वेद-पारायण कर लिया एवं उसने सभी आर्यगुणों का संचय कर लिया। इसलिए जिसकी जीभ पर तुम्हारा नाम है, वह चाण्डाल होने पर भी अत्यन्त पूज्य है।'          इस श्लोक से यह बात मन मे कई बार आती है कि सचमुच कलियुग के अनर्थकारी वातावरण में पड़कर हम लोगों ने शास्त्रों पर श्रद्धा खो दी; अन्यथा श्रीमद्भागवत के एक बार पढ़ लेने पर भी भगवान का नाम कैसे छूटना चाहिए। यह वचन अर्थवाद नहीं है। इनको कहने वाली स्वयं भगवतज्जननी हैं एवं जगत पर प्रकट करने वाले महाऋषि वेदव्यास...

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*           *१०३* *जैसे भी हो, जिव्हा को श्रीभगवन्नाम के उच्चारण में लगाइये*    प्रश्न है कि सच्ची चाह उत्पन्न  कैसे हो। संतो का यह अनुभव है कि मलिन मन में शुद्ध चाह उत्पन्न नहीं होती। इसलिये सबसे पहले मन को शुद्ध करना है। मन शुद्ध करने का उपाय आजकल लिये एक ही है। वह है भगवत भजन। किंतु मलिन मन भगवद् भजन में लग जाय, यह भी कठिन है। इसलिए एक काम करें-जिव्हा से ही भजन करते जायँ, लेते जाँय भगवान का नाम। नाम में ऐसी अपूर्व शक्ति है कि अपने-आप मन लगने लगेगा। बिना श्रद्धा बिना प्रेम केवल हठपूर्वक जिव्हा को श्रीभगवन्नाम के उच्चारण में लगाइये,मन लगे तो उत्तम है, नहीं तो कोई परवाह नहीं। यदि जिव्हा ने नाम का आश्रय नहीं छोड़ा तो सब कुछ अपने आप नाम की कृपा से हो जायगा। श्रीरामकृष्ण परमहंस जी महाराज ने कहा--कोई अमृत के कुण्ड उतरकर अमृत-पान करे अथवा पैर फिसल कर गिर पड़े अथवा किसी के धकेल देने पर गिर पडे अथवा जान-बूझकर जबर्दस्ती उस कुण्ड में गिरा दिया जाय, यदि अमृत का संस्पर्श हुआ तो गिरने वाला चाहे किसी प्रकार से गिरा हो, अमर हो जायगा। उसी...

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*         *१०२* *भगवान के चरणों में अपने आपको समर्पित करने की सच्ची चाह जाग्रत करें* स्मर्तव्य: सतत विष्णुर्विस्मर्तव्यो न जातुचित्। सर्वे बिधिनिषेधाः स्युरेतयोरेव किंकराः।। (पद्म/उत्तर ७२, १००)          बस, मनुष्य-जीवन की सार्थकता इसी में है कि निरन्तर श्रीभगवान को स्मरण किया जाय। उपर्युक्त वचन महर्षि श्रीवेदव्यास के हैं, जिनके वचन त्रिकाल-सत्य हैं। वे कहते हैं कि शास्त्र में जितनी विधियाँ हैं अर्थात् 'ऐसा करो' और जितने निषेध हैं अर्थात् ‘ऐसा नहीं करो, सबका अन्तर्भाव सबका पर्यवसान इसी में है कि निरन्तर भगवान को याद रखो और कभी भगवान को मत भूलो।          हम लोगों ने अनन्त जन्मों में अनन्त बार परिवार इकट्ठे किये,अनन्त बार गृहस्थी की, अनन्त बार ‘मेरा-मेरा' कहकर अनन्त प्राणियों का मोह-जाल बाँधा, किंतु किसी भी जन्म में एक बार के लिये भी हृदय से सच्चे मन से श्रीभगवान को मेरा कहकर नहीं पुकारा, वरण नहीं किया। यह यदि किया होता तो फिर अब हमारी यह दशा नहीं होती। इसलिये इस बार अब भूल न करें। हृदय की सारी श...

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*           *१०१* *अधिक-से-अधिक भगवान का नाम लिया करें*           भगवान् आज भी अपने भक्तों को उनके भावनानुसार कृतार्थ करने के लिये तैयार हैं। निष्काम भक्तों को प्रेमदान एवं दर्शनों के द्वारा तथा सकाम भक्तों को उनकी वांछित वस्तु देकर भगवान् आज भी कृतार्थ करते हैं। हमारा विश्वास उठ गया है, जिसके कारण हम लोगों की तबाही है। भगवान पर श्रद्धा नहीं रही, अन्यथा भगवान् बिना किसी भेद-भाव सबको स्वीकार कर सकते हैं। इसीलिये मैं बारंबार आप लोगों से एक ही प्रार्थना किया करता हूं कि अधिक-से-अधिक भगवान का नाम लिया करें। बड़े-बड़े संत-महात्माओं का यह अनुभव है कि जो जितना अधिक भजन करेगा, वह उतनी ही शीघ्रता से भगवान की ओर बढ़ेगा। भगवान में श्रद्धा प्रेम होकर जल्दी-से-जल्दी उन्हें प्राप्त किया जा सके, इसका एकमात्र उपाय इस युग के लिये है--नाम का आश्रय। इसलिये फिर भी यही प्रार्थना है कि चाहे हठ से ही क्यों न हो, वाणी का संयम कर और आवश्यकता भर बोलेने के बाद बाकी का सब समय नाम-जप में लगायें। जैसे-जैसे अन्तःकरण पवित्र होगा, वैसे-वैसे अपने-...

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*         *१००* *सकाम उपासना करने वाले को भी भगवत्प्रेम प्राप्त होता है*     महाप्रभु चैतन्य ने कहा है--'जिस तरह नदी के प्रवाह में अनन्तकाल से बहता हुआ कोई तिनका किनारे लग जाता है, वैसे ही अनादिकाल से संसार की नाना योनियों में भ्रमण करता हुआ कोई जीव किसी अत्यन्त भाग्यबल से निस्तार पा जाता है।’ श्रीमद्भागवतमें भी ठीक इसी प्रकार का भाव व्यक्त किया गया है-- *मैवं ममाधमस्यापि स्यादेवाच्युतदर्शनम्।*  *हियमाण: कालनद्या क्वचित्तरति कश्चन ।।*            'हे विभो! निराभिमानी पुरुष केवल आपके चरणों की सेवा ही आपसे माँगते है, सो मैं भी वही वर आपसे माँगता हूँ और कोई भी वासना मुझे नहीं है। हे हरि! जो मुक्ति देने वाले आप हैं, उनको आराधना द्वारा प्रसन्न करके कौन विवेकी पुरुष, जिनसे आत्मा का बन्धन हो, वे आपसे भोग माँगेगा ? अथवा यह विचार करना भूल है। यद्यपि मैं अधम हूँ, तथापि अच्युत के दर्शन मुझे प्राप्त ही होगे। जैसे नदी में बह रहे तृणों में कोई तृण किनारे लग जाते वैसे ही काल के प्रवाह में कर्मवश बह रहे जीवों में को...

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*             *९९* *भगवान और भक्त का सम्बन्ध बड़ा मधुर होता है*           आपने लिखा कि कर्मों का फल तो भोगना ही पड़ता है--यह बिलकुल ठीक है ; कितु इसके साथ अपवाद भी है। जिस प्रकार किसी अपराधी को हाईकोर्ट ने फाँसी की सजा दे दी है, उस सजा को कोई रोक हो सकता पर यदि बादशाह या उस राज्य का सदस्य अधिकारी चाहें तो उसकी सजा बदल सकते हैं, उसे बिल्कुल माफ भी कर सकते हैं, यही नहीं ऐसी घटनाएँ कितनी बार हो चुकी है, उसी प्रकार कर्म के फल को भगवान चाहें तो भोगने से किसी को बिल्कुल बरी कर सकते हैं। अवश्य ही भगवान का भक्त यह चाहता नहीं। किसी दिन भगवत्कृपा से ही आप समझ पाएँगे कि वस्तुत भगवान् और भक्त का सम्बन्ध कितना मधुर होता है। हमारी कल्पना इस जगत को देखकर उसी आधार पर भगवान् के विषय में निर्णय देती है। पर उसका यह निर्णय वस्तुतः बिल्कुल गलत है। भैया! भगवान कितने दयालु हैं, यह बात तब तक हमारी धारणा में आ ही नहीं सकती जब तक वे स्वयं समझा न दें। अवश्य ही न समझने पर भी वस्तुस्थिति तो यह है ही कि हम सभी उनके अहैतुक दयाप्रवाह में ही ब...

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*             *९८* *सब होते हुए भी दयामय की कृपा का पलड़ा ही भारी रहेगा*             एक बात हमेशा ध्यान में रखने की है कि हम कितना भी क्यों न चाहें, किन्तु हमारा जो संकल्प भगवान की इच्छा से समन्वित नहीं होगा, वह कभी पूरा हो नहीं सकता। अत: जब कोई हमारी धारणा के प्रतिकूल बात आकर प्राप्त हो तो विश्वास कर लेना चाहिये कि प्रभु की इच्छा से ही ऐसा हुआ है। अवश्य ही व्यवहार में प्रतिकूल परिस्थिति प्राप्त होने पर ऐसा मन हो जाना कठिन है,किंतु भगवत दया का आश्रय करके यदि आप चेष्टा करेंगे तो ऐसा हो जाना कोई बड़ी बात नहीं हैं। यह केवल हम मानते हों, ऐसी बात नहीं है। वस्तुत: यह सिद्धान्त है कि जो कुछ भी प्रतिकूलता प्राप्त होती है, उसमें भी श्री कृपामय भगवान का हाथ है और उसका परिणाम मंगल ही होगा। अगर किसी प्रकार मनुष्य यह विश्वास कर सके तो उसकी सारी चिन्ता घट जाय और फिर उसके द्वारा केवल भजन होगा। देखें मनुष्य के न चाहने पर भी प्रतिकूलता तो आती ही है। प्रारब्ध में यदि प्रतिकूलता है तो आकर ही रहेगी। फिर उसके लिये चिन्ता करन...

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*              *९७* *हम सुख-दुख के भोग में सर्वथा परतन्त्र हैं*           मनुष्य कल्पना के राज्यों ही विचरा करता है किंतु इस बात को भूल जाता है कि इस जागतिक कल्पना का कोई मूल्य नहीं है। वह अगर थोडा भी ध्यान दे तो उसे पता लग सकता है कि सुख-दुख भोग में वह सदा परतन्त्र है। भले ही निमित्त कुछ बने, किंतु ये किसी अचिन्त्य-शक्ति के नियमन में स्वयं जाकर प्राप्त हो जाते हैं। भैया ! यह समझना कठिन है, किन्तु बिल्कुल ठीक है कि इसमें किसी प्रकार की शंका की गुंजाइश नहीं है। यह कानून है-- 'जो कछु रचि राख्यो नन्दनन्दन मेटि सके नहेि कोय।' यदि आप यह समझ लें तो फिर आपको दुख हो ही नहीं। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*          *९६* *व्यावहारिक जगत में भगवान को साथ रखिये*           भगवान में विश्वास की कमी के कारण, दूषित वातावरण का असर पडने के कारण एवं पूर्व के संस्कारों के कारण बहुत बार हम लोगों के मन में परिवार को लेकर चिन्ताएँ आ सकती हैं। उस समय जगत का महत्व भगवान की अपेक्षा अधिक हो जाता है। वस्तुतः जागतिक चिन्ता तभी आती, जब भगवान गौण हो जाते हैं और जगत् प्रधान। इसलिये खूब सावधान रहना चाहिये कि एक क्षण के लिये भी भगवान गौण नहीं होने पायें। आप विश्वास रक्खें कि जैसे-जैसे भगवान् मुख्य उद्देश्य होते जायेंगे वैसे-वैसे यह चिन्ता हटती जायगी। एक बात और है--साधना मार्ग में खासकर भगवत्-शरणागति में किसी भी जागतिक चिन्ता को मन में स्थान ही नहीं देना चाहिये। यदि हम भगवान के हो गये, नहीं, सदैव ही भगवान के थे, हैं और रहेंगे तो हमसे सम्बद्ध यावन्मात्र पदार्थ भी भगवान के ही हैं। क्या भगवान को अपनी चीजों का ध्यान नहीं है ? क्या हम उनसे ज्यादा चतुर एवं बुद्धिमान हैं, जो उनकी अपेक्षा भी अधिक अच्छी तरह किसी चीज की संभाल करेंगे ? वस्तुतः सच्ची ...

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*            *९५* *भगवान् पर विश्वास और नामजप हमारे लिए सब कुछ कर देगा*            मुझे तो यही सही जान पड़ता है कि यदि मनुष्य अधिक-से-अधिक भगवन नाम पर विश्वास बढ़ाता चला जाय तो भगवान् उसे अपने आप लक्ष्य तक पहुँचा देतेहै। यह केवल मेरी ही प्रतीति नहीं है, यह एक बड़ा सिद्धान्त है और आजतक जितने बड़े-बड़े संत हो गये हैं, प्रायः सभी ने इसका समर्थन किया है। श्रीभगवन्नाम का वस्तु-गुण है कि वह भगवान में श्रद्धा उत्पन्न करा देता है। इतना ही नहीं, नाम की स्वाभाविक महिमा कितनी है, यह बतलाना बहुत कठिन है। भगवत्प्रेम की प्राप्ति अर्थ-धर्म-काम-मोक्ष--इन चार पुरुषार्थों की अपेक्षा भी अत्यन्त उत्कृष्ट एवं पञ्चम पुरुषार्थ मानी जाती है। यह प्रेम भगवन्नाम सुलभ करा देता है। यह बात उन संतों द्वारा समर्थित की गयी है, जो भगवत्प्रेम को प्राप्त कर कृतार्थ हो चुके हैं। जैसे-जैसे दिन बीतते जाते हैं, वैसे-वैसे भगवन्नाम परायण व्यक्ति का स्वयं यह विश्वास दृढ़ होता जाता है कि भगवन्नाम से बढ़कर कोई दूसरा साधन नहीं है। इसलिये मैं प्रत्येक...

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*             *९४* *किसी भी परिस्थिति में घबराइये नहीं, अधिक-से-अधिक भजन कीजिये*           जिस प्रकार अमावस्या के घने अन्धकार के पश्चात् ज्योत्स्नामयी शुक्लपक्ष की रात का श्रीगणेश होता है, वैसे ही कभी-कभी लीलामय भगवान अपनी पूर्ण कृपा से प्लावित करने से पहले भयानक, अत्यन्त असह्य रात्रि में अपने प्रिय भक्त को बिल्कुल अंधा-सा बना देते है। अवश्य ही मंगलमय का यह विधान भी, चाहे ऊपर से देखने में कितना भी भीषण क्यों न हो, मंगल से ओत-प्रोत रहता है। इसीलिये विश्वासी भक्त किसी भी परिस्थिति में चिन्तित न होकर अपने प्रियतम भगवान की प्रत्यक्ष दया का दर्शन करते हुए मुग्ध होते रहते हैं। जहाँ तक आपके जीवन के सम्बन्ध में सोचता हूँ तो यही मालूम पड़ता है कि दयामय भगवान् अब तक जितनी कृपालुता से आपके जीवन को उन्नत बनाते आये हैं, उसके स्मरणमात्र से ही आपको मुग्ध होते रहना चाहिये। मेरी यह दृढ़ धारणा है कि किसी-न-किसी दिन इसी जीवन में आप यह ठीक देख पायेंगे कि भगवान की कृपालुता गुप्तरूप से ही किस प्रकार आपके योगक्षेम का वहन करती आ रही...

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*             *९३* *कृपा का आश्रय करके आगे बढ़ चलें*    वास्तव में आवश्यकता है-शास्त्र पर, महापुरुषों के वचनों पर श्रद्धा करने की। फिर कोई कार्य शेष रहता नहीं; साधन तो अपने-आप होने लग जाता  है। *****सारी त्रुटि भगवान की कृपा से ही दूर हो सकती है। उनकी कृपा भी सब पर है। केवल उस कृपा का ही आश्रय करके हम आगे बढ़ चलें, अन्धकार अवश्य ही दूर होगा। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*               *९२* *विपत्ति के अवसर पर भी भगवान का सहारा मत छोड़िये*           प्रारब्ध का फल होकर ही रहेगा, टाला नहीं जा सकता है। भगवान देख पायें बात दूसरी है, वे सर्वसमर्थ, चाहे सो कर सकते हैं। किंतु नश्वर शरीर के लिये भगवान् को कहना अल्पज्ञता है। दुःख के समय मनुष्य प्रायः चंचल हो जाया करता है, उस समय वह भक्ति के सुन्दर भावों को पल्लवित करने में कठिनता का अनुभव करता है। परंतु बुद्धिमानी इसी में है कि कठिन विपत्ति के अवसर पर भी भगवान का सहारा छोड़कर मनुष्य किसी दूसरी ओर न दौड़े-मुड़े। भगवान् के सिवा मनुष्य यदि किसी भी दूसरे की शरण लेता है तो समझना चाहिये कि भगवान पर उसकी श्रद्धा नहीं है। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*                *९१* *दुःख से भरी हुई परिस्थितियों का स्वागत कीजिये*          घबराइये मत। जो हो रहा है, मंगल के लिये हो रहा है। एक बार भी अपने को प्रभु के ऊपर छोड़ देने पर भगवान् फिर उसे नहीं छोड़ते। चैतन्य महाप्रभु ने कहा है- ‘सेवक तो ऐसा हो कि मालिक को छोड़े नहीं और मालिक ऐसा हो कि सेवक के छोड़ देने पर उसकी शिखा पकड़कर उसे ले आये। आजकल के सेवक भगवान को बारंबार पकड़ते और छोड़ते हैं, पर भगवान का कायदा वही है। वे अपनी प्रतिज्ञा से तनिक भी नहीं हटते- *‘न मे भक्त: प्रणश्यति'।* खूब आनन्द से जीवन बिताइये। दुःख से भरी हुई परिस्थितियों को भगवान का विशेष पुरस्कार समझकर उनका स्वागत कीजिये। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*          *९०* *निर्भय होकर आगे बढ़ते जाइये*    पारिवारिक झंझटों से मन कभी-कभी खिन्न हो जाता है ठीक है, अभी ऐसा हो सकता है,  किन्तु बिल्कुल घबरायें नहीं। भगवान की कृपा से आपमें भगवान को प्राप्त करने की इच्छा जाग्रत हुई है, उस कृपा से ही एक दिन *वासुदेवः सर्वमिति* के रूप में जगत दीख सकता है। उस दिन यह झंझट नहीं रहेगा,आनन्द का स्रोत बह जायगा। निर्भय होकर आगे बढ़ते जाइये, भगवान् आपके पीछे हैं। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*          *८९* *भगवत्कृपाका पात्र कौन है--इसका पता नहीं लग सकता*         भगवान जिस तरह रखें, उसी तरह रहने में पूर्ण संतोष रखना चाहिए। इस प्रपञ्चिक जगत के हेर-फेर से इस बात का पता नहीं लग सकता कि भगवत्कृपा का पात्र कौन है। कोढ़ी, सबसे अपमानित, सबकी नज़रों से गिरा हुआ, लोगों की दृष्टि में ‘पापी' नाम से प्रसिद्ध, सबकी घृणा का पात्र, भूख से कराहता हुआ भी भगवत्कृपा का पात्र हो सकता है,फिर उसे कोई जाने चाहे नहीं। भगवत्कृपा को प्राप्त करने वाले संत लाल कपड़े में ही हों, यह बात नहीं है। उजले कपडे में छिपे हुए आज भी कितने संत भारत की भूमि को पवित्र कर रहे, जिसका हमें पता नहीं। बस, पूर्ण समर्पण की अपनी ओर से तैयारी करते रहें। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*            *८८* *शरण ले लेने के पश्चात् किसी प्रकार की चिन्ता नहीं रहनी चाहिये*          सर्वेश्वर एवं दयामय की शरण ले लेने के पश्चात् किसी प्रकार की चिन्ता नहीं रहनी चाहिये। मनुष्य की यह एक भूल होती है कि वह अपने को भगवान् का शरणागत समझता है तथा साथ-ही-साथ भविष्य में मेरा क्या होगा--इस प्रकार की चिन्ता भी करता है। सच्ची बात यह है कि मनुष्य शक्ति भर भगवान को समर्पण करने की तैयारी कर लेता है तो उसके लिये कोई कर्तव्य नहीं बच जाता। अतः भविष्य की चिन्ता मन में न आने पाये। बल्कि यह चिन्ता हो कि अपनी ओर से तैयारी में त्रुटि तो नहीं रह गयी है। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*             *८७* *घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है*           जिस दिन भगवान पर पूर्ण विश्वास हो जाता है, उस दिन कोई कर्तव्य शेष नहीं रह जाता। हम लोगों के अन्दर विश्वास की कमी है। इसलिये मन में तरह-तरह की बातें उठा करती हैं। अवश्य ही घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है। जिन्होंने अपनी अहैतुकी दया से आपको इस ओर प्रवृत्त किया, वे ही आगे भी बढ़ाते जायेंगे। विश्वास रखिये---भगवान अपने नाममात्र के भक्तपर भी प्रेम की अनन्त धारा किसी-न-किसी दिन बरसा ही देते हैं। बाट देखते रहिये। आपके जीवन में भी ऐसी ही बात होगी क्योंकि आपनेे भगवान की शरण ली है फिर चाहे अपूर्ण भाव से ही शरण ली हो। उनकी शरणागतवत्सलता कितनी दिव्य है, इस बात की हम लोग कल्पना भी नहीं कर सकते। वह जागतिक मन की कल्पना के अतीत है, बस उनकी कृपा से ही उस शरणागतवत्सलता का दर्शन कर निहाल होने की आशा में जीवन काटते जाइये।  *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*        *८६* *बस भगवान का नाम लेते जाइये*    हम सब श्रीभगवान की असीम दया में अवगाहन कर रहे हैं, किन्तु लीलामय ही है कि सबको एक साथ अपनी अहैतुकी दया का परिचय नहीं देते। उनकी दया से कोई प्राणी वञ्चित नहीं है। समय एवं सुविधा अनुसार यदि आप भी चेष्टा करेंगे, अर्थात् और कुछ भी न बने उनका नाम ले-लेकर उन्हें पुकारते रहेंगे,तो आपको भी उस दयाका परिचय अवश्य मिल जायगा---यह मेरा विश्वास है। भगवान का स्वभाव बड़ा विलक्षण है जिसे वे एक बार अपनी ओर खींच लेते हैं, उसका परित्याग करते नहीं। बस भगवान का नाम लेते जाइये। यह मेरी एकमात्र प्रार्थना है। *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*