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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ* *१५९* *मेरी इतनी ही सलाह है* मेरी इतनी ही सलाह है कि सत्संग में जो कुछ भी सुनें, उसको प्रिया-प्रियतम के अखण्ड स्मरण में सहायक बना लें। बस इससे अधिक मैं क्या लिखूँ-- तनहिं राखु सत्संग में, मनहि प्रेमरस भेव। सुख चाहत हरीबन्सहित, कृष्ण कल्पतरु सेव।। निकसि कुंज ठाढ़े भए, भुजा परस्पर अंस। राधाबल्लभ-मुख-कमल, निरखत हित हरिबंस ।। सबसे हित निकाम मन, बृन्दाबन बिश्राम। राधाबल्लभ लाल कौ, हृदय ध्यान, मुख नाम।। रसना कटौ जु अनरटौ, निरखि अन फुटौ नैन। सवन फुटो जो अनसुनौ, बिनु राधा जसु बैन।। * * * और सबसे अन्तिम बात यह है कि निरन्तर नाम लीजिये ; और कुछ भी नहीं करना है, सब भगवान् करेंगे। संतों से सुना है--‘दूसरा क्या करता है, इस ओर मत देखो ; तुमसे कितने पाप होते हैं, यह देखो।' निष्पाप होने का यह सरल साधन है। यदि तुम्हारे मन मे...